तृणमूल संकट: पूर्व मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक ने सभी पदों से दिया इस्तीफा

कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस में जारी संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुक्रवार को पूर्व मंत्री ज्योति प्रिय मलिक ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफ दे दिया जबकि उत्तरी बंगाल में तृणमूल के वरिष्ठ नेता गौतम देब ने सिलीगुड़ी नगर निगम के महापौर पद से त्यागपत्र देते हुए सरकारी गाड़ी व सुरक्षा वापस कर दी।

तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी के लंबे समय तक सहयोगी रहे मलिक ने कहा कि वह अपने इस फैसले की जानकारी पार्टी नेतृत्व को पहले ही दे चुके हैं। दूसरी ओर, अधिकारियों ने बताया कि देब ने सिलीगुड़ी नगर निकाय के आयुक्त को अपना इस्तीफ़ा भेजा है। मलिक ने कहा, ”मैंने अपनी बहुत खराब सेहत की वजह से तृणमूल के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। पिछले कुछ महीनों में मेरी सेहत बहुत ज्यादा बिगड़ गई है।

मेरे शरीर में शर्करा का स्तर असामान्य रूप से बढ़ गया है और मुझे गुर्दे की गंभीर बीमारी है। ऐसे हालात में, पार्टी की कार्यकारी समिति और दूसरे पदों की ज़म्मिेदारियां निभाना नामुमकिन हो गया है। जब आप काम ही नहीं कर सकते, तो किसी पद पर बने रहने का कोई मतलब नहीं है।’ यह घटनाक्रम बनर्जी द्वारा संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल करने और मलिक को नवगठित कार्यकारी समिति में शामिल करने के कुछ ही दिनों बाद हुआ है।

पांच बार के विधायक मलिक 2011 से 2021 तक राज्य के खाद्य और आपूर्ति मंत्री और उसके बाद के तीन वर्षों तक राज्य के वन मंत्री रहे। वह पहली बार गायघाट से चुनाव जीते और उसके बाद उत्तर 24 परगना के हाबरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। उत्तर 24 परगना जिले के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक होने के नाते मलिक ने पिछले दो दशकों में इस क्षेत्र में पार्टी संगठन को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई।

मलिक को 2026 के विधानसभा चुनावों में अपने गढ़ ‘हाबरा’ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के देबदास मंडल के हाथों अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। मंडल ने उन्हें 31,000 से ज्यादा मतों के अंतर से हराया। मलिक के राजनीतिक करियर को तब बड़ा झटका लगा था, जब अक्टूबर 2023 में कथित राशन वितरण घोटाले के सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उन्हें गिरफ्तार किया था। उन्हें करीब 15 महीने जेल में बिताने के बाद जनवरी 2025 में जमानत पर रिहा किया गया।

मलिक ने गिरफ्तारी के बाद बार-बार स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का हवाला दिया और हिरासत में रहते हुए उनकी चिकित्सा जांच भी हुई।
मलिक ने ऐसे समय अपना इस्तीफा दिया है जब भाजपा की राज्य में जीत के बाद तृणमूल के संसदीय और विधायक दल में पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत हुई है।

मलिक ने पार्टी में बगावत को लेकर पूछे गए सवाल पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ”ममता बनर्जी को लेकर मुझे कोई निराशा नहीं है। जिन लोगों ने उनके खिलाफ बगावत की है, वे अनुभवी नेता हैं और ऐसा करने के पीछे उनकी अपनी वजहें जरूर होंगी।” सत्तारूढ़ भाजपा के प्रवक्ता देबजीत सरकार ने मलिक के इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जिस पार्टी का ”अस्तित्व ही खत्म हो चुका है”, उसके लिए ऐसे कदमों का कोई खास महत्व नहीं है।

देबजीत ने कहा, ”हो सकता है कि वह पार्टी के पदों से इस्तीफा दे दें, लेकिन इससे उन्हें अपने अपराधों से मुक्ति नहीं मिलेगी। देश के कानून के मुताबिक ही उनके मामले में फ़ैसला होगा।” इस बीच, राज्य की सत्ता में हुए बदलाव के बाद सिलीगुड़ी के महापौर देब ने शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया। इससे पहले कोलकाता के महापौर फिरहाद हकीम और बिधाननगर की महापौर कृष्णा चक्रवर्ती भी इस्तीफा दे चुकी हैं।

दार्जिंिलग की पहाड़ियों में गोरखा क्षेत्रीय प्रशासन के मुख्य कार्यकारी और ममता बनर्जी के सहयोगी अनित थापा ने भी 17 जून को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। सिलीगुड़ी में भाजपा नेता और राज्य के पर्यटन मंत्री शंकर घोष ने देब के इस कदम को तृणमूल नेताओं की ”अक्षमता का सबूत” बताया।



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