दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना के सामने डटा रहा ईरान, उसकी रणनीतियों से क्या सीख ले ऑस्ट्रेलिया?

सिडनी: परमाणु हथियारों से लैस क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी इजराइल और दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकत (अमेरिका) के साथ लगभग चार महीने के युद्ध के बाद भी ईरान पराजित नहीं हुआ है। ईरान की सरकार अब भी अपनी आबादी और अपने क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए हुए है। हालांकि उसकी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा है लेकिन उसका औद्योगिक ढांचा अब भी मिसाइलों, ड्रोन और रॉकेटों का उत्पादन कर रहा है।

तेहरान ने अपने कई शीर्ष नेताओं को खो दिया, लेकिन जीवित बचे नेता बातचीत को अपने हित में मोड़ने के लिए अब भी दृढ़ दिखाई देते हैं।
निस्संदेह, कई मायनों में आॅस्ट्रेलिया और ईरान एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। साथ ही, आॅस्ट्रेलिया के सामने फिलहाल युद्ध का कोई आसन्न खतरा भी नहीं है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वह ईरान के अनुभवों से कुछ नहीं सीख सकता।

बदलते युद्ध स्वरूप और आॅस्ट्रेलिया जैसे मध्यम ताकत वाले देशों की रक्षा तैयारियों के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सबक इस प्रकार हैं:

अपरंपरागत प्रतिरोधक क्षमता

युद्ध से पहले ईरान के ‘प्रतिरोध की धुरी’ का नेटवर्क (यमन में हूती, लेबनान में हिजबुल्ला, गाजा में हमास और इराक में शिया मिलिशिया) उसे रणनीतिक तौर पर मजबूत करता आ रहा था।

अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर पिछले वर्ष 12 दिन तक और इस वर्ष हमला किया लेकिन उन्होंने यह जानते हुए ऐसा किया कि ईरान के सहयोगी समूह जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं, उनके सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते हैं, बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकते हैं या उनके साझेदारों को कमजोर कर सकते हैं। संघर्ष के दौरान ये सब हुआ।

आॅस्ट्रेलिया कभी भी आतंकवाद को प्रायोजित नहीं करेगा। हालांकि, यदि वह नैतिक और कानूनी मानकों का पालन करे तो अपरंपरागत प्रतिरोधक रणनीति अपनाना उसके लिए भी संभव है।

उदाहरण के लिए, आॅस्ट्रेलिया छोटे लेकिन अत्यधिक प्रशिक्षित और आधुनिक हथियारों से लैस दलों के साथ-साथ हवाई, समुद्री और पानी के भीतर संचालित ड्रोन का सहारा ले सकता है। ताकि कोई संभावित प्रतिद्वंद्वी उस पर हमला करने के बारे में सोचते से पहले दोबारा जरूर सोचे।

युद्ध शुरू होने के बाद भी प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखें प्रतिरोधक क्षमता को अक्सर युद्ध से पहले अपनाई जाने वाली रणनीति माना जाता है। सामान्य धारणा यह है कि यदि युद्ध छिड़ जाए, तो प्रतिरोधक नीति विफल हो चुकी है। हालांकि, अधिक अनुभवी विश्लेषक ‘युद्धकालीन प्रतिरोधक क्षमता’ की बात करते हैं, यानी युद्ध शुरू होने के बाद भी विरोधी को रोकने की क्षमता।

उदाहरण के लिए, ईरान ने ड्रोन और समुद्री सुरंगों का इस्तेमाल कर अमेरिकी जहाजों को फारस की खाड़ी से दूर रखने और खार्ग द्वीप स्थित अपने तेल र्टिमनल पर अमेरिकी कार्रवाई को कठिन बनाने का प्रयास किया।

क्षेत्रीय संबंधों को मजबूत बनाएं हालांकि ईरान ने अपने कई खाड़ी पड़ोसी देशों के साथ टकराव किया लेकिन पाकिस्तान और ओमान के साथ संबंध उसके काम आए।

दोनों देशों ने युद्ध समाप्त कराने के लिए वार्ता की मेजबानी की और संघर्ष के दौरान तनाव कम करने में भूमिका निभाई। इसी तरह, युद्ध शुरू होने से पहले क्षेत्र के कई देश इजराइल या अमेरिका के विमानों को अपने सैन्य ठिकानों के उपयोग या अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति देने के इच्छुक नहीं थे। इसमें ईरान के कूटनीतिक प्रयासों की भी भूमिका रही। आॅस्ट्रेलिया के लिए क्षेत्रीय संबंध युद्ध के समय सहयोग का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं।

दुश्मन की जरूरतों को अपने प्रभाव के दायरे में रखें युद्ध शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया।
इसके जवाब में अमेरिका और इजराइल ने अपने हवाई अभियान को और तेज किया तथा ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर जवाबी कदम उठाया। अमेरिका के युद्धपोतों ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाले तेल टैंकरों को सुरक्षा प्रदान करनी शुरू कर दी।

इसके बावजूद, ईरान वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के एक महत्वपूर्ण हिस्से को प्रभावित करने की स्थिति में बना रहा, जिससे वार्ता में दबाव बनाना उसके लिए आसान हो गया।

लचीलेपन के लिए विकेंद्रीकरण जरूरी इजराइल और अमेरिका के हमलों में युद्ध के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई, लेकिन इसके बावजूद ईरान ने लगभग बिना रुके संघर्ष जारी रखा। इसका एक बड़ा कारण उसकी ‘मोजेक रक्षा रणनीति’ थी। इसके तहत सैन्य अधिकार स्वत? 31 क्षेत्रीय कमांडरों को सौंप दिए गए थे, जिन्हें युद्ध शुरू होने से पहले निर्धारित लक्ष्यों पर कार्रवाई करने की स्वतंत्रता थी। इससे ईरान की सरकार को अस्थिर करना कठिन हो गया।

आॅस्ट्रेलिया जैसे विशाल क्षेत्रफल और बिखरी आबादी वाले देश के लिए भी विकेंद्रीकृत कमान एवं नियंत्रण व्यवस्था व्यावहारिक हो सकती है।
मजबूत रक्षा उद्योग तैयारी करे ईरान के पास विशाल सैन्य बल है। इसमें लगभग 3.4 लाख नियमित सैनिक, ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (आईआरजीसी) के करीब 1.2 लाख सदस्य और लगभग छह लाख बसीज मिलिशिया सदस्य शामिल हैं। इससे अमेरिका और इजराइल के शुरूआती हमलों के बाद लामबंदी के लिए एक बड़ा आधार मिला।

इसी प्रकार, ईरान का रक्षा उद्योग भी विकेंद्रीकृत है। भीषण हवाई हमलों के बावजूद वह सुरक्षित, छिपे हुए और अलग-अलग स्थानों पर मौजूद संयंत्रों में मिसाइलों और ड्रोन का उत्पादन जारी रखने में सक्षम रहा। आॅस्ट्रेलिया इससे यह सीख सकता है कि वह अपने रक्षा उद्योग, विशेषकर दोहरे उपयोग वाली सुविधाओं तथा छोटे एवं मध्यम उद्योगों को अधिक विकेंद्रीकृत बनाए। साथ ही खनिज, ईंधन, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य महत्वपूर्ण पुर्जों जैसे विनिर्माण संसाधनों का भंडारण बढ़ाए।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यह सामान्य अभ्यास था और इसे फिर से रणनीतिक सोच का हिस्सा बनाने की जरूरत है। लंबी दूरी के हथियार और पर्याप्त भंडार ईरान ने लंबी दूरी तक मार करने वाले, अपेक्षाकृत कम लागत वाले और तेजी से निर्मित किए जा सकने वाले रॉकेटों, मिसाइलों और ड्रोन की प्रभावशाली विविधता का प्रदर्शन किया है।

इससे यह सबक मिलता है कि युद्ध में केवल गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि संख्या भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। ऐतिहासिक रूप से आॅस्ट्रेलिया के पास अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी से लैस सेना रही है, लेकिन उसकी क्षमता सीमित रही है। उदाहरण के लिए, हालिया रक्षा रणनीतिक समीक्षा में सेना की बख्तरबंद क्षमता को इतना घटा दिया गया कि वह संभवत? केवल एक सीमित सैन्य अभियान को ही लंबे समय तक जारी रख सके।

भविष्य के संघर्षों के लिए आॅस्ट्रेलिया को हथियारों और गोला-बारूद के बड़े भंडार की जरूरत होगी। इसके लिए कम लागत वाले ड्रोन, रॉकेट और मिसाइलों में अधिक निवेश करना होगा तथा उपयुक्त स्थानों पर पर्याप्त गोला-बारूद का भंडारण करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के दौरान भी हथियारों का उत्पादन जारी रखने की क्षमता विकसित करनी होगी।



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