क्या है इच्छामृत्यु, जिसकी भारत में पहली बार मिली मंजूरी: इतिहास में कहां जिक्र, अलग-अलग देशों में नियम कैसे?

नयी दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को एक ऐतिहासिक फैसला दिया। न्यायालय ने पहली बार देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मंजूरी दे दी। कोर्ट का यह फैसला हरीश राणा बनाम केंद्र सरकार के मामले में आया है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए एक 32 वर्षीय युवक हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील को स्वीकार कर लिया। गाजियाबाद हरीश एक इमारत से गिरने के बाद बीते 13 साल से लगातार अचेत अवस्था में हैं। दिन प्रतिदिन बेटे की बिगड़ती हालत के बाद उनके माता-पिता ने कोर्ट में अपील दायर कर बेटे को जिंदा रखने के सभी साधनों को हटाने की मांग की थी।

इससे पहले भारत की अदालतों में इच्छामृत्यु की मांग वाले कई मामले आए। इन सभी मामलों में कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह इच्छामृत्यु की इजाजत नहीं दे सकता। इसके पीछे संविधान को एक अहम वजह बताया गया। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है और यह कैसे दी जाती है? दुनियाभर में इच्छामृत्यु का क्या इतिहास रहा है और मौजूदा समय में इसको कहां-कहां मंजूरी मिली है? भारत में इच्छामृत्यु पर अब तक अदालतों का क्या रुख रहा है? अब तक देश में इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार क्यों नहीं की गई?

पहले जानें- क्या है निष्क्रिय इच्छामृत्यु, साधारण इच्छामृत्यु से कितनी अलग?
इच्छामृत्यु का मतलब है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना जो किसी असाध्य या लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो। इस तरह की मृत्यु को मंजूरी देने का प्राथमिक उद्देश्य यही रखा गया था कि बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को असहनीय शारीरिक पीड़ा और कष्ट से मुक्ति मिल सके।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मंजूरी दी, वह क्या है? इच्छामृत्यु को मुख्यतः दो तरह से बांटा जाता है। एक- सक्रिय इच्छामृत्यु और दूसरी निष्क्रिय इच्छामृत्यु।

1. सक्रिय इच्छामृत्यु

सक्रिय इच्छामृत्यु, जिसे एक्टिव यूथेनेशिया कहते हैं, इसमें मरीज की मृत्यु को संभव करने के लिए सीधे तौर पर कोई सक्रिय कदम उठाया जाता है। उदाहरण के लिए- मरीज को कोई घातक पदार्थ या इंजेक्शन (जैसे सोडियम पेंटोथोल) देना, जिससे व्यक्ति को कुछ ही सेकंड में गहरी नींद आ जाए और उसकी नींद में ही दर्द रहित मृत्यु हो जाए।

2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु
वहीं, निष्क्रिय इच्छामृत्यु, जिसे पैसिव यूथेनेशिया कहते हैं, में मरीज के जीवन को लंबे समय तक बनाए रखने वाले जरूरी चिकित्सा उपचार को रोक दिया जाता है या हटा लिया जाता है। इसमें डॉक्टर सक्रिय रूप से मरीज को मारते नहीं हैं, बल्कि वे जीवन बचाने वाले इलाज या प्रणालियों को रोक देते हैं। उदाहरण के लिए- जीवन रक्षक प्रणालियों जैसे वेंटिलेटर, कृत्रिम तौर पर जिंदा रखने की तकनीक या दवाओं को हटा लेना, ताकि मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त कर सके।

दुनियाभर में इच्छामृत्यु का क्या इतिहास रहा?

प्राचीन काल
प्राचीन काल में मृत्यु को चिकित्सा के बजाय सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाता था। होमर के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘इलियड’, जो कि लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व में रचा गया था, इसमें घायल योद्धाओं के दर्द को खत्म करने के लिए दया मृत्यु या इच्छा मृत्यु मांगने का जिक्र मिलता है।
भारत में भी पुराने हिंदू ग्रंथों में तपस्वियों के लिए प्रायोपवेश (आमरण अनशन या व्रत द्वारा प्राण त्यागना) पारंपरिक चलन में था। इसका जिक्र महाभारत में भी मिलता है।

दूसरी तरफ सुदूर यूनान में दार्शनिक प्लेटो ने अपनी किताब रिपब्लिक में असाध्य रूप से बीमार लोगों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था। हालांकि, लगभग 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली हिप्पोक्रेटिक ओथ ने सक्रिय इच्छामृत्यु को यह कहते हुए प्रतिबंधित कर दिया कि डॉक्टर किसी भी मरीज के मांगने पर उसे घातक दवा नहीं देंगे।

रोमन साम्राज्य में सेनेका जैसे विचारकों ने असाध्य रोगियों के लिए तार्किक आत्महत्या की प्रशंसा की, जबकि चिकित्सक गैलेन ने उपचार रोक कर (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) मृत्यु का समर्थन किया।

मध्यकाल
दुनियाभर में ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को सख्त रूप से वर्जित कर दिया गया। ऑगस्टीन और थॉमस एक्विनास ने इसे हत्या के समान और ईश्वर के विरुद्ध बताया।

दूसरी तरफ इस्लाम धर्म में मृत्यु को तेज करने के लिए जीवन रक्षक उपायों को हटाने (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) को तो स्वीकार किया, लेकिन किसी भी प्रकार की हिंसक हत्या (सक्रिय इच्छामृत्यु) पर प्रतिबंध लगा दिया। यहूदी धर्म में भी केवल अप्रत्यक्ष रूप से मृत्यु को आसान बनाने की अनुमति थी।

19वीं और 20वीं सदी
19वीं सदी में मेडिकल साइंस (सर्जरी और एनेस्थीसिया) के विकास के बाद यह बहस फिर से शुरू हुई। 1870 में सैमुअल डी. विलियम्स ने अंतिम अवस्था वाले मरीजों के लिए क्लोरोफॉर्म के इस्तेमाल का सुझाव दिया।
20वीं सदी में, नाजी जर्मनी के टी4 प्रोग्राम चलाया गया। 1939-1945 के बीच नाजियों ने इस इच्छामृत्यु की अवधारणा का गलत इस्तेमाल किया और यहूदियों की बड़े पैमाने पर हत्याएं की गईं। नाजियों का कहना था कि उन्होंने तीन लाख तथाकथित अयोग्य और मंदबुद्धि लोगों को गैस चैंबर में भेजकर मारा है। इसके बाद पूरी दुनिया में इच्छामृत्यु को लेकर डर पैदा हो गया।

हालांकि, इसके बाद दुनियाभर में इच्छामृत्यु को लेकर सुधार की लहर चली और ब्रिटेन में 1935 में ‘वॉलंटरी यूथेनेशिया सोसाइटी’ का गठन हुआ।
क्या दुनिया में अब कहीं मान्य है इच्छामृत्यु?
जर्मनी में इच्छामृत्यु को लेकर जो नरसंहार की घटनाएं हुईं, उसके बाद इसे मंजूरी देने पर लंबे समय तक बहस जारी रही। हालांकि, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के उदय के साथ इच्छामृत्यु को कानूनी अधिकार मिलने लगे। इस ओर सबसे पहला कदम ऑस्ट्रेलिया में उठाया गया, जहां नॉर्दर्न टेरिटरी ने ‘राइट्स ऑफ द टर्मिनली इल’ कानून पारित किया, जिसके तहत कुछ मरीजों को इच्छामृत्यु दी गई। हालांकि इसे बाद में रद्द कर दिया गया। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया की ओर से की गई पहल को बाद में कई देशों ने अपनाया।

1. कौन से देशों में इच्छामृत्यु को मान्यता
नीदरलैंड ने 2001 और बेल्जियम ने 2002 में स्पष्ट नियमों और दिशा-निर्देशों के साथ सक्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी रूप से वैध किया है। बेल्जियम और लक्जमबर्ग (2010) ने इस अधिकार को नाबालिगों के लिए भी विस्तारित किया है।
कनाडा ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसके तहत वर्ष 2024 में 15,300 से अधिक इच्छामृत्यु के मामले (कुल मौतों का 4.7%) सामने आए हैं।
स्विट्जरलैंड में 1942 से ही सहायता प्राप्त आत्महत्या को कानूनी मान्यता प्राप्त है, जिसका संचालन डिग्निटास जैसी संस्थाएं करती हैं।
अमेरिका के ओरेगन राज्य ने 1997 में ही डेथ विद डिग्निटी एक्ट लागू कर दिया था। 2026 की स्थिति के अनुसार, अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में यह मॉडल मान्य है, जबकि 40 राज्यों में इस पर सख्त प्रतिबंध है।
एशिया में जापान जीवन रक्षक प्रणालियों को हटाने यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देता है।
अन्य देश: स्पेन (2021), ऑस्ट्रिया (2022), ऑस्ट्रेलिया (2017), न्यूजीलैंड (2021 में जनमत संग्रह द्वारा), कोलंबिया (2014) और इक्वाडोर (2024) में भी सहायता प्राप्त मृत्यु के विभिन्न रूपों को कानूनी अनुमति मिली हुई है। जर्मनी में 2020 से सहायता प्राप्त मृत्यु की अनुमति है।

स्कैंडिनेवियाई देश: स्वीडन और नॉर्वे जैसे देशों में मरीजों की स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए कुछ सख्त शर्तों के साथ डॉक्टरों की मदद से मृत्यु की अनुमति देते हैं।

2. इच्छामृत्यु पर कहां-कहां सख्त प्रतिबंध?
इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी स्वरूप पर सख्त धार्मिक प्रतिबंध लागू हैं।

दूसरी ओर फ्रांस और ब्रिटेन में भी सक्रिय रूप से मृत्यु देने के बजाय मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए सिडेशन (नशे वाली दवाओं से दर्द दूर करना) और बेहतर देखभाल को प्राथमिकता दी जाती है।



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