ईरान में क्यों भड़का देशव्यापी प्रदर्शन?: महंगाई से शुरू आंदोलन, कैसे विद्रोह में तब्दील; जानिए अभी तक क्या हुआ

तेहरान:ईरान में पिछले कई दिनों से सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। देशभर में फैला यह आंदोलन हाल के वर्षों में इस्लामिक शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। महंगाई से शुरू हुआ गुस्सा अब सीधे सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और पूरे शासन तंत्र के खिलाफ नारेबाजी में बदल चुका है।
सरकार ने हालात काबू में करने के लिए इंटरनेट और फोन सेवाएं फिलहाल बंद कर दी हैं, जिससे ईरान लगभग बाहरी दुनिया से कट गया है। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, अब तक दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि हजारों को हिरासत में लिया गया है।
विरोध प्रदर्शन की शुरुआत कैसे हुई?
इन प्रदर्शनों की शुरुआत 28 दिसंबर को रियाल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के बाद तेहरान के बाजारों से हुई, जहां व्यापारियों ने आसमान छूती महंगाई के खिलाफ दुकानें बंद कर प्रदर्शन शुरू किया। हालात तब और बिगड़े जब खाने के तेल, चिकन जैसी जरूरी चीजों की कीमतें रातोंरात बढ़ गईं और कई सामान बाजार से गायब हो गए। सरकार द्वारा सस्ती डॉलर व्यवस्था खत्म करने के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया। अब तक ये प्रदर्शन सभी 31 प्रांतों में फैल चुका हैं। मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, कम से कम 62 प्रदर्शनकारी मारे गए, जिनमें कई बच्चे भी शामिल हैं।
कितना व्यापक है यह आंदोलन?
यह आंदोलन 2022 के ‘वूमन, लाइफ, फ्रीडम’ आंदोलन के बाद सबसे बड़ा माना जा रहा है। अब तक 100 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन हो चुके हैं। पश्चिमी ईरान के कुर्द बहुल इलाकों में हालात सबसे ज्यादा तनावपूर्ण हैं। प्रदर्शनकारियों के नारे अब सीधे सत्ता के केंद्र पर हैं- ‘खामेनेई मुर्दाबाद’, ‘तानाशाह का नाश हो’ और रजा पहलवी के नेतृत्व में राजशाही की वापसी जैसे नारे तेहरान, मशहद और अन्य प्रमुख शहरों में खुलेआम लगाए जा रहे हैं।
इस बार आंदोलन क्यों अलग है?
इस बार सबसे अहम बात यह है कि आंदोलन की शुरुआत बाजारी समुदाय से हुई, जो ऐतिहासिक रूप से इस्लामिक गणराज्य का समर्थक रहा है। ईरान में बाजारी और धार्मिक नेतृत्व के बीच पुराना गठबंधन रहा है। इतिहास में दुकानदारों ने कई बार सत्ता परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाई है। 1979 की इस्लामिक क्रांति में भी इन्हीं बाजारियों के आर्थिक समर्थन ने मौलवियों को मजबूती दी, जिससे शाह की सत्ता का पतन संभव हो पाया।
हालांकि इस बार मुद्रा अस्थिरता और गिरती अर्थव्यवस्था ने उनके व्यापार को इतना प्रभावित किया कि वही वर्ग अब सड़कों पर उतर आया। यही विरोध आगे चलकर हिंसक रूप ले बैठा। वहीं, सरकार आर्थिक मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों और शासन परिवर्तन की मांग करने वालों के बीच फर्क करने की कोशिश कर रही है। शासन विरोधी प्रदर्शनकारियों को ‘उपद्रवी’ और ‘विदेशी ताकतों के एजेंट’ बताकर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई का संकेत दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंदोलन बड़े बदलाव की ओर इशारा कर सकता है।
अमेरिका और खामेनेई का क्या रुख?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ईरान को चेतावनी दी है कि अगर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने तेहरान को साफ संदेश दे दिया है कि प्रदर्शन के दौरान लोगों की हत्या बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके बाद तेल कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक में उन्होंने दोहराया कि ईरानी सुरक्षा बलों को फायरिंग से बचना चाहिए, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका वहीं हमला करेगा, जहां सबसे ज्यादा दर्द होगा।





