ईरान युद्ध में ट्रंप को क्यों नहीं मिल रहा साथ?: नाटो से लेकर यूरोप और एशियाई देश भी दूर, जानें क्या है वजह

नई दिल्ली: अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए आज 19वां दिन है। दोनों ही पक्षों की तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ हमले जारी हैं। इस्राइल ने मंगलवार को एलान किया कि उसने ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी को मार गिराया है, जिसकी पुष्टि ईरान की तरफ से कर दी गई है। दूसरी तरफ ईरान की मीडिया की तरफ से दावा किया गया है कि देश के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने इस संघर्ष को जारी रखने की बात कही है।

उनकी तरफ से पहले ही एक संदेश में होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद रखने की घोषणा की गई थी, जिसके चलते दुनियाभर में तेल के दाम आसमान छूने लगे हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपने सहयोगी देशों से अपील की थी कि वे होर्मुज खुलवाने के लिए अपने युद्धपोतों को क्षेत्र में भेजें। हालांकि, न तो अब तक होर्मुज खोलने को लेकर अमेरिका की तरफ से कोई कदम उठाया गया है और न ही उसके सहयोगी देशों ने ही अपनी नौसेना को भेजने से जुड़ी कोई बात कही है।

ऐसे में दुनियाभर में यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर क्यों अमेरिका को ईरान के खिलाफ युद्ध में पहले की तरह का समर्थन नहीं मिल रहा है? पश्चिमी देशों का संगठन नाटो इस युद्ध में अब तक क्यों नहीं कूदा है? यूरोप की सभी बड़ी ताकतें इस संघर्ष को लेकर क्या रुख रख रही हैं? एशिया में मौजूद अमेरिका के सहयोगी क्या कर रहे हैं? इसकी वजह क्या है? आइये जानते हैं…

पहले जानें- ईरान संघर्ष में क्या है अमेरिका-इस्राइल के समर्थन की स्थिति?

ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राइल के संघर्ष में उनके सहयोगियों का समर्थन अब तक काफी सीमित रहा। ज्यादा यूरोपीय और एशियाई सहयोगियों ने इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल होने या होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए सैन्य मदद देने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मांग को खारिज कर दिया है।

1. यूरोपीय सहयोगियों का क्या रुख?

ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने इस युद्ध में अमेरिका का साथ देने से इनकार कर दिया है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना है। जर्मनी के रक्षा मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि “यह हमारा युद्ध नहीं है और हमने इसे शुरू नहीं किया है।”

कुछ इसी तरह स्पेन ने खुले तौर पर डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किए जाने के फैसले की निंदा की है और अमेरिकी राष्ट्रपति की मांग को खारिज करते हुए कहा है कि युद्ध तुरंत खत्म होना चाहिए। स्पेन ने अमेरिकी लड़ाकू विमानों के लिए अपने एयरबेस तक के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी है।
इसके अलावा हाल ही में जब ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य का बेहद अहम तेल आपूर्ति मार्ग सुरक्षित करने के लिए सहयोगी देशों से मदद मांगी तब या तो यूरोपीय देशों ने अपने युद्धपोत भेजने से इनकार किया है या ट्रंप की मांग को लेकर चुप्पी साध ली।

ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई-6 के पूर्व प्रमुख और पूर्व ब्रिटिश राजदूत जॉन सॉवर्स के मुताबिक…

2. एशियाई सहयोगी क्यों दूर?

अमेरिकी मैगजीन- द इकोनॉमिस्ट ने विश्लेषकों के हवाले से बताया है कि अमेरिका के एशियाई सहयोगी, जैसे जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और यहां तक कि सुदूर ऑस्ट्रेलिया भी इस युद्ध से दूरी बनाए हुए है। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि एशियाई देशों को डर है कि अमेरिका का साथ देने पर वे एक ऐसे दूरस्थ युद्ध में उलझ जाएंगे जिस पर उनका कोई सीधा नियंत्रण नहीं है। इसके अलावा कई एशियाई देशों में जनता इस युद्ध में शामिल होने के सख्त खिलाफ है। जापान में 75% लोग इसका विरोध कर रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लिखा गया जापान का संविधान भी युद्ध क्षेत्रों में सेना भेजने के खिलाफ है।

दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया में श्रमिक संघों ने युद्धपोत भेजने के विचार को एक आक्रामक युद्ध का समर्थन करार दिया है और इसका विरोध किया। कोरियाई मीडिया ने तंज कसते हुए कहा कि ट्रंप ने खुद यह आग लगाई और अब दक्षिण कोरिया से आग बुझाने का बिल मांग रहे हैं।

3. नाटो अब तक युद्ध में क्यों नहीं कूदा?

ब्रिटेन के पूर्व रक्षा प्रमुख जनरल सर निक कार्टर के मुताबिक, नाटो को एक रक्षात्मक गठबंधन के रूप में बनाया गया था। यह कोई ऐसा गठबंधन नहीं था, जिसे इसलिए डिजाइन किया गया हो कि कोई एक सहयोगी अपनी मर्जी से युद्ध शुरू करे और फिर बाकी सभी को अपने पीछे चलने के लिए मजबूर करे। उन्होंने तो यहां तक कहा कि मुझे यकीन नहीं है कि यह उस तरह का नाटो है, जिससे हम में से कोई भी जुड़ना चाहता था।

दूसरी तरफ फ्रांस के रक्षा विश्लेषक फ्रांस्वा हेसबर्ग ने अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, “इस बार विचार-विमर्श का दिखावा तक नहीं किया गया। परामर्श और निर्णय लेने की जगह के रूप में, यह गठबंधन मूल रूप से खत्म हो गया है, क्योंकि अमेरिकियों को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।”
विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि राष्ट्रपति ट्रंप लगातार अपने सहयोगी देशों का अपमान करते आ रहे हैं, जिसकी वजह से अब उन्हें मदद मांगने पर असहजता का सामना करना पड़ रहा है। एस्टोनिया के पूर्व राष्ट्रपति टॉमस हेंड्रिक इल्वेस उन्होंने ट्रंप द्वारा मदद मांगने को थोड़ा अजीब बताते हुए कहा, “अफगानिस्तान में लड़ने वाले लगभग 1,000 नाटो सैनिकों की यादों का अपमान करने के बाद यह कहना कि ‘ओह, अब आप सभी को आकर हमारी मदद करनी चाहिए।’ अगर देश सेना भेजते हैं और उन्हें कुछ हो जाता है, तो क्या वह फिर से उनका मजाक उड़ाएंगे? यह शुरुआत से ही राजनीतिक रूप से एक असंभव बात है।”

तो क्या कोई भी देश इस युद्ध से नहीं जुड़ा?

पश्चिमी और एशियाई देशों ने भले ही इस संघर्ष में प्रत्यक्ष तौर पर अमेरिका और इस्राइल का साथ नहीं दिया है, हालांकि आक्रामकता से इतर कुछ देशों ने अपनी सेना या जहाज भेजे हैं, लेकिन उनकी भूमिका पूरी तरह से रक्षात्मक या अपने हितों को सुरक्षित करने तक सीमित है।
ब्रिटेन: प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने स्पष्ट किया है कि ब्रिटेन इस व्यापक युद्ध का हिस्सा नहीं बनेगा। हालांकि, जब ईरान के सहयोगी हिजबुल्ला ने साइप्रस में एक ब्रिटिश बेस पर हमला किया, तो स्टार्मर ने अमेरिका को सिर्फ रक्षात्मक उद्देश्यों के लिए अपने बेस का उपयोग की इजाजत दे दी। इसके अलावा ब्रिटेन ने अपने सैनिकों और खाड़ी के सहयोगियों की रक्षा के लिए कुछ सैन्य संपत्तियां तैनात की हैं।

फ्रांस: फ्रांस ने भी युद्ध में शामिल होने से इनकार किया है। इसके बावजूद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने क्षेत्र में अपने कई नौसैनिक जहाज और एक परमाणु विमानवाहक पोत भेजा है। इसका उद्देश्य युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि युद्ध समाप्त होने के बाद समुद्री नेविगेशन की सुरक्षा सुनिश्चित करना और भविष्य की चर्चाओं में फ्रांस की कूटनीतिक स्थिति मजबूत रखना है।
ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया ने पश्चिम एशिया में एक कमांड-एंड-कंट्रोल विमान और कुछ हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें भेजी हैं। लेकिन उसने बहुत सावधानी से यह स्पष्ट किया है कि यह कदम अमेरिका के युद्ध का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की रक्षा करने के लिए उठाया है, जहां बड़ी संख्या में ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रहते हैं।

जर्मनी: जर्मनी ने युद्ध से खुद को अलग रखा है, लेकिन उसने शुरुआत से ही अमेरिकी सेना को जर्मनी में मौजूद अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की छूट दी है। वह खुद इस संघर्ष में हथियार या सैन्य बल के जरिए सहयोग नहीं दे रहा है।

तो क्या कोई इस युद्ध में अमेरिका के खिलाफ भी?
इस युद्ध में अमेरिका और इस्राइल के खिलाफ मुख्य रूप से ईरान और उसके समर्थित सशस्त्र गुट- लेबनान में हिज्बुल्ला और यमन में हूती लड़ रहे हैं। हालांकि, कुछ देश इस पूरे संघर्ष को लेकर या तो विरोध में रहे हैं या अब तक तटस्थ रहे हैं।

अमेरिका-इस्राइल के हमलों के खिलाफ कौन से देश?

रूस और चीन ने अब तक अमेरिका और इस्राइल के कदमों का खुलेआम विरोध किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस ने ईरान की मदद के लिए उसे अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उस पर हो रहे हमलों से जुड़ी खुफिया जानकारी मुहैया कराई है। इसके अलावा कुछ स्रोतों में यह भी कहा गया है कि चीन हथियारों के जरिए ईरान की मदद करने की कोशिश कर रहा है। चीन ने ऐसी रिपोर्ट्स से इनकार जरूर किया है, लेकिन इस संघर्ष को लेकर इस्राइल और अमेरिका का तगड़ा विरोध किया है।

इसके अलावा ब्राजील ने भी सीधे तौर पर अमेरिका-इस्राइल के ईरान पर हमलों का विरोध किया है। लातिन अमेरिकी देश मैक्सिको और कोलंबिया ने भी ब्राजील का साथ देते हुए इस युद्ध में तुरंत संघर्ष विराम की मांग की है।

युद्ध को लेकर कौन से देशों का रुख तटस्थ?
भारत, तुर्किये, पाकिस्तान: ये देश सैन्य रूप से अमेरिका के खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन इन्होंने अमेरिका की मदद करने के बजाय ईरान के साथ एक समझौता कर लिया है, ताकि उनकी तेल आपूर्ति और व्यापारिक मार्ग खुले रहें। कुछ इसी तरह का रुख भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने भी उठाया है और अमेरिका के साथ बेहतर रिश्ते रखते हुए ईरान से भी बातचीत जारी रखी है।

यूरोपीय देश: स्पेन जैसे कुछ सहयोगियों ने खुले तौर पर अमेरिका की कड़ी निंदा की है और इस आक्रामक युद्ध को खत्म करने की मांग की है। इटली और फ्रांस भी लगातार ईरान की सरकार से बातचीत की कोशिश में जुटे हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने की कोशिशों में जुटे हैं।



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