मदर्स डे: वर्दी और ममता; फर्ज और मातृत्व के कर्ज को एक साथ चुकातीं देश की रक्षक मां, पढ़ें इन महिलाओं की प्रेरक कहानियां

नई दिल्ली: कभी एंबुलेंस की सायरन के बीच, कभी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में, कभी ट्रैफिक के शोर के बीच सड़क पर, तो कभी सरहद और समंदर की चुनौतियों के बीच, कई मांएं ऐसी हैं जो अपनी ममता को घर तक सीमित नहीं रखतीं। वे इमरजेंसी और चुनौतीपूर्ण सेवाओं में काम करते हुए हर दिन दूसरों की जिंदगी सुरक्षित बनाने का काम करती हैं। इन महिलाओं के लिए ड्यूटी का कोई तय समय नहीं होता। त्योहार, जन्मदिन, स्कूल फंक्शन या परिवार के खास पल अक्सर सब कुछ पीछे छोड़कर उन्हें अपने काम के लिए निकलना पड़ता है।
लेकिन इसके बावजूद वे अपने बच्चों के लिए वही प्यार, वही सुरक्षा और वही भरोसा बनाए रखती हैं, जो हर मां की पहचान है। मदर्स डे पर सलाम उन मांओं को, जो सिर्फ अपने बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सुरक्षा, सेवा और समर्पण की मिसाल बनी हुई हैं।
जब एक मां वर्दी पहनती है, तो उसका बच्चा भी सैनिक बन जाता है – कमांडर गौरी मिश्रा
देश सेवा केवल सीमा पर खड़े होकर नहीं होती, कई बार अपने दिल के सबसे करीबी रिश्तों से दूर जाकर भी ड्यूटी निभानी पड़ती है। मेरे कॅरिअर में एक समय ऐसा आया जब मुझे अचानक एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक नियुक्ति पर तत्काल जॉइन करना पड़ा। उस समय मेरा बेटा तीन साल का था। एक मां के लिए अपने छोटे बच्चे को छोड़ना बहुत दुखदायी होता है लेकिन वर्दी पहनने के बाद कई बार आंसुओं से पहले कर्तव्य को चुनना पड़ता है। फिर कोविड का दौर आया तो यह दूरी और लंबी होती चली गई। उस समय मैंने महसूस किया कि जब एक महिला सैनिक बनती है तो उसका बच्चा भी बचपन से ही संघर्ष करना सीख जाता है। मातृत्व अवकाश के बाद भी मेरा बेटा डे-केयर में पला क्योंकि मेरी ड्यूटी के घंटे कभी तय नहीं होते थे लेकिन उन्हीं कठिन परिस्थितियों ने उसे असाधारण बना दिया। मात्र छह वर्ष की आयु में उसने 150 किलोमीटर की नॉन-स्टॉप साइक्लिंग कर विश्व रिकॉर्ड बनाया। आज 11 वर्ष की उम्र में उसके नाम पांच वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज है।
बेटी की आवाज सुन… थकान खत्म हो जाती है
कई बार ऐसा होता है कि मेरा बच्चा सो चुका होता है और मैं अस्पताल में किसी दूसरे बच्चे की जान बचाने की कोशिश कर रही होती हूं। उस पल एक डॉक्टर और मां दोनों भावनाएं साथ चलती हैं। ड्यूटी के लंबे घंटों के बाद जब मेरी 9 साल की बेटी पूछती है, मम्मा, आप लोगों को ठीक करके आईं? तो सारी थकान खत्म हो जाती है। रोज कोई न कोई बच्चा जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है। ऐसे में मां की ममता वहां भी एक जैसी होती है। बच्चा अपना हो या पराए का, ममता तो ममता है। इस पेशे में चुनौतियां जरूर होती है, लेकिन सही समय पर सही प्राथमिकता तय करना ही इस सफर को संभव बनाता है। – डॉ. प्रियंका सिंह, ओकुलोप्लास्टी सर्जन
मुझसे दूर रहने की वजह से मेरे बच्चे मुझे दीदी कहने लगे थे
कहते हैं, बच्चे के मुंह से पहली दफा खुद के लिए मां सुनना काफी खुशनुमा सा होता है लेकिन मैं इस खुशी से अंजान रही हूं। 1991 में मैंने पुलिस की वर्दी पहनी थी और 1998 में बड़े बेटे ने जन्म लिया। पहले मैटरनिटी चार माह की मिलती थी। इसलिए जब बेटा बहुत छोटा था तभी उसे अपनी मां और बहन के पास छोड़ दिया था। छुट्टियों में जब भी बेटे से मिलने जाती तो वो मुझे मां के बजाय दीदी बुलाता। बहुत समझाने के बाद उसने मुझे मां बोलना शुरू किया था। एक बार बेटे के जन्मदिन पर घर पर सारी तैयारियां और ढ़ेर सारे मेहमान आए थे। उस वक्त इंस्पेक्टर थी। मुझे सीनियर डीसीपी सर ने एक टॉस्क सौंपा जिसमें काफी समय लग गया। मैंने सर से कहा, मेरे बेटे का जन्मदिन है, मुझे जल्दी जाना है। सर ने कहा बता क्या गिफ्ट भिजवाउं। मैंने कहा सर बस छुट्टी दे दो, वही सबसे बड़ गिफ्ट है। घर जब पहुंची तो वो सो चुका था। फिर जगाकर जन्मदिन मनाया। हमें इसी तरीके से वर्दी और ममता में कभी वर्दी, तो कभी ममता को चुनना पड़ता है। खैर आज मेरे दोनों बेटे बड़े हो गए हैं, और यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। -लक्ष्मी कंवत, डीसीपी (दिल्ली पुलिस सिक्योरिटी)
पेरेंट-टीचर मीटिंग में शामिल नहीं होने का मलाल
ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी के साथ एक मां कि जिम्मेदारी निभाना आसान नहीं होता। कई बार परिवार को समय नहीं दे पाती। पति फौज में हैं तो बच्चों की जिम्मेदारी मुझपर आ जाती है। अक्सर अपने बच्चों के एडमिशन की तारीख अपनी छुट्टी के मुताबिक बदलती हूं। हमेशा मलाल रहता है कि ड्यूटी की मजबूरियों के चलते आज तक स्कूल की पेरेंट-टीचर मीटिंग में नहीं जा पाई। ड्यूटी के बीच जब भी मुझे आराम करने का वक्त मिलता है तो उसे अपने बच्चों को देती हूं। कभी-कभी देर रात जागकर घर के और बच्चों के काम करने होते हैं। क्योंकि कि दिन में कभी भी कोई भी इमरजेंसी कॉल आ जाती है लेकिन जब मेरा बच्चा कहता है कि मम्मी लोगों को सुरक्षित घर पहुंचाती हैं तो गर्व महसूस होता है। -सतीश कुमारी, ट्रैफिक पुलिस






