हर साल 1100 बार चीन से होता है सामना’: जनरल द्विवेदी ने बताया कितनी बदली सैन्य रणनीति, अग्निपथ पर क्या कहा?

नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में तनाव के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हालात भले ही पहले से स्थिर हुए हों, लेकिन भारतीय सेना अभी भी पूरी तरह सतर्क है। निवर्तमान सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने खुलासा किया है कि भारत और चीन की सेनाओं के बीच हर साल 1100 से अधिक जमीनी स्तर की बातचीत होती है, ताकि सीमा पर किसी भी तरह की गलतफहमी से बचा जा सके। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय सेना तेजी से अपनी सैन्य रणनीति बदल रही है और भविष्य के युद्धों के लिए खुद को तैयार कर रही है।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपने कार्यकाल के अनुभव साझा करते हुए कहा कि एलएसी पर शांति बनाए रखने के लिए लगातार सतर्कता, मजबूत सैन्य तैयारी और बातचीत बेहद जरूरी है। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को भारतीय सेना की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बताया और कहा कि इस अभियान ने सेना की संयुक्त, एकीकृत और भविष्य के युद्धों के लिए तैयार क्षमता को साबित किया है। इसके साथ ही उन्होंने अग्निपथ योजना, आत्मनिर्भरता और सेना के आधुनिकीकरण पर भी विस्तार से अपनी बात रखी।

क्या एलएसी पर भारत-चीन के रिश्तों में सुधार हुआ?

जनरल द्विवेदी ने कहा कि 2024-25 के दौरान भारत और चीन के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई सकारात्मक घटनाक्रम हुए हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन, सैन्य वार्ता और संवाद की प्रक्रिया लगातार जारी है। कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, सीमा व्यापार को दोबारा शुरू करने पर सहमति और सैन्य वार्ताओं की बढ़ती संख्या से संबंधों में धीरे-धीरे सामान्य स्थिति लौटने के संकेत मिले हैं।
उन्होंने कहा कि भारत और चीन की सेनाओं के बीच हर साल 1100 से अधिक जमीनी स्तर की बातचीत होती है। इसके अलावा हॉटलाइन, फ्लैग मीटिंग और कमांडर स्तर की बैठकों के जरिए स्थानीय मुद्दों को सुलझाया जाता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि एलएसी पर स्थिति स्थिर जरूर है, लेकिन संवेदनशील बनी हुई है और भारतीय सेना किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।

ऑपरेशन सिंदूर ने सैन्य रणनीति को कैसे बदला?

जनरल द्विवेदी ने कहा कि हाल के वर्षों में भारतीय सेना की सबसे बड़ी उपलब्धि ऑपरेशन सिंदूर रहा है। उनके अनुसार, इस अभियान ने दिखाया कि भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़े जाएंगे, बल्कि तकनीक, ड्रोन, साइबर क्षमता और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने सेना की संयुक्त और एकीकृत युद्ध क्षमता को साबित किया। इस दौरान तकनीक, सुरक्षित संचार प्रणाली, सटीक हमले की क्षमता और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल का प्रभावी प्रदर्शन देखने को मिला। जनरल द्विवेदी के मुताबिक, सेना अब मल्टी-डोमेन वॉरफेयर की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।



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