फिल्म समीक्षा: जश्न मनाने का पूरा मौका देती है थलापति की ‘जन नायकन’, हिंदी भाषी दर्शकों को खलेगी यह कमी

सबसे पहले तो आपको यह साफ कर दूं कि यह फिल्म पूरी तरह से सिर्फ विजय की फिल्म है। यह उनके फैंस के लिए एक ऐसा ट्रिब्यूट है जिसे वो हमेशा याद रखेंगे पर कई मायनों में यह फिल्म कमजोर भी है। जहां एक तरफ कुछ एक्शन सीन, कलाकारों का अभिनय और विजय की एंट्री दमदार है। वहीं दूसरी तरफ फिल्म की कहानी, वीएफएक्स और क्लाइमैक्स निराश करते हैं।
कम शब्दों में कहें तो इस तरह की कहानी विजय की पिछली फिल्मों में भी देखने मिली है और आप भी फिल्म देखते हुए ऐसा ही कुछ महसूस करेंगे। खैर यहां फिल्म के पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों ही पॉइंट पर विस्तार बात करते हैं।
कहानी
फिल्म की कहानी थालपति वेत्री कोंडन उर्फ टीवीके (विजय) नाम के एक शख्स की है जो जेल में बंद है। एक दिन एक जेलर (गौतम वासुदेव मेनन) को उस पर दया आती है और वो नियमों के खिलाफ जाकर उसे उसकी बूढ़ी मां (रेवती) से मिलवा देता है।
नियम तोड़ने के चलते जेलर को सजा के तौर पर सस्पेंड कर दिया जाता है। कैद से रिहा होकर थलापति उसे जेलर की बेटी विजी (ममिता बैजू) का खयाल रखने लगता है। एक दिन जेलर की एक्सीडेंट में मौत हो गई और विजी को संभालने का जिम्मा थलापति ले लेता है।
दूसरी तरफ एंट्री होती है जॉन हेमलर (बॉबी देओल) की जो एक निर्दयी हत्यारा है। वो साउथ अफ्रीका में कत्लेआम मचाने के बाद अब भारत में भी आतंकवाद को बढ़ावा देने आया है।
इसी बीच एक दिन विजी किडनैप हो जाती है। जब थलापति उसे बचाने जाता है तो उसका सामना होता है जॉन हेमलर से। जॉन का एक अतीत है जिसमें वो कभी डिप्टी कमिश्नर अमरीश पुजारी हुआ करता है। क्या है यह अतीत? और इसका थलापति से क्या है कनेक्शन? यह फिल्म के सेकंड हाफ में पता चलता है।
अभिनय
विजय थलापति ही इस फिल्म की जान हैं और यह फिल्म उतना ही देखने लायक है जितनी देर विजय स्क्रीन पर आते हैं। उनका जोश, उनका आक्रोश, डायलॉग्स, हिंदी डब वर्जन में संकेत महात्रे की आवाज और डांस सब कुछ कमाल है। थिएटर में आप भी उनकी एंट्री पर चिल्लाने पर मजबूर हो सकते हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस वाकई देखने लायक है।
बॉबी देओल बीती कुछ फिल्मों में एक सा अभिनय कर रहे हैं। ‘एनिमल’, ‘अल्फा’ और अब ‘जन नायकन’ तीनों में ही उनके एक्सप्रेशन और किरदार एक से है। निमर्म हत्यारे के एक जैसे एक्सप्रेशन देखकर आपको कुछ खास महसूस नहीं होता।
पूजा हेगड़े फिल्म में सिर्फ नाम के लिए हैं। ममिता बैजू पूरी फिल्म में अच्छी लगी हैं, उनकी खासियत यह है कि जैसा रोल दे दिया जाए वो वैसी लगने लगती हैं। प्रकाश राज, गौतम वासुदेव मेनन, प्रियामणि और नासर ने अपना काम ठीक किया है।
निर्देशन
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी अधूरा निर्देशन है। कई सीन अच्छे हैं पर सभी तरह के सीन मिलाकर एक अच्छी फिल्म बनती है। निर्देशक जानते थे कि यह थलापति कि आखिरी फिल्म है इसलिए कई सीन और कहानी के कुछ हिस्सों में वो लॉजिक के पीछे नहीं गए।
फर्स्ट हाफ तक कहानी आधी-आधी ही समझ आती है। सेकंड हाफ की शुरुआत में फिल्म बेहतर होती है। फ्लैशबैक और स्कूल वाले सीन कमाल हैं लेकिन क्लाइमैक्स तक आते-आते ओवर ड्रामा और जरूरत से ज्यादा लंबी होने के चलते यह बिखरने लगती है।
बॉबी देओल का पूरा ट्रैक ही कमजोर हैं। उनके कई सीन में जबरन वीएफएक्स का यूज किया है, जो अच्छे भी नहीं लगते। साउथ अफ्रीका वाला पार्ट ना भी होता तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके अलावा भी कई ऐसी चीजें है जो अजीब और इमोशन-लेस है पर यह सच है कि विजय ही इस फिल्म को देखने लायक एंटरटेनर बनाते हैं।






