लिएंडर पेस की कहानी: टेनिस में भारत को पहला ओलंपिक पदक दिलाया, टूटी कलाई से जीता कांस्य; जादुई है पूरा किस्सा

भारतीय टेनिस की बात हो और लिएंडर पेस का नाम न आए, ऐसा शायद ही कभी होता है। पेस को दुनिया के सबसे सफल डबल्स खिलाड़ियों में गिना जाता है और उनकी उपलब्धियां उन्हें भारतीय खेल इतिहास के सबसे बड़े दिग्गजों में शामिल करती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर पेस की चमकदार उपलब्धियों ने भारतीय टेनिस को नई पहचान दिलाई। खास तौर पर 1996 अटलांटा ओलंपिक में जीता गया उनका कांस्य पदक न सिर्फ ऐतिहासिक था, बल्कि इसने भारत में टेनिस की नई पीढ़ी को भी प्रेरित किया। उनकी इसी सफलता से प्रेरित होकर आगे चलकर सोमदेव देववर्मन, रोहन बोपन्ना जैसे खिलाड़ियों ने सिंगल्स और डबल्स टेनिस में अपना करियर बनाया और देश का नाम रोशन किया।

क्यों चर्चा में हैं लिएंडर पेस?
पूर्व टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस पश्चिम बंगाल 2026 के चुनावों से पहले भाजपा में शामिल हो गए हैं। मंगलवार को दिल्ली मुख्यालय में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और सुकांत मजूमदार की मौजूदगी में उन्होंने भाजपा का दामन थामा। पेस साल 2021 से तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हुए थे।

पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनावों से पहले लिएंडर पेस का भाजपा में शामिल होना तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ा झटका भी माना जा रहा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान लिएंडर पेस से मिले थे और इस मुलाकात में सौमिक भट्टाचार्य भी शामिल हुए थे। तभी से ऐसी अटकलें लगा जा रही थीं कि पेस जल्द ही भाजपा से जुड़ सकते हैं। पेस को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने फूलों का एक बुके और भाजपा की सदस्यता वाली पर्ची देकर पार्टी में स्वागत किया।

पिता और मां भी रहे एथलीट
17 जून 1973 को कोलकाता में जन्मे पेस एक ऐसे परिवार से आते हैं, जहां खेल और ओलंपिक की विरासत पहले से मौजूद थी। उनके पिता वेस पेस 1972 म्यूनिख ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा थे, जबकि उनकी मां जेनिफर पेस 1980 एशियाई बास्केटबॉल चैंपियनशिप में भारतीय टीम की कप्तान रही थीं। ऐसे माहौल में पले-बढ़े पेस के लिए खेल सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि उनके जीवन का हिस्सा था।

1996 अटलांटा ओलंपिक में कांस्य जीतने की कहानी
पेस ने महज 18 साल की उम्र में 1992 बार्सिलोना ओलंपिक के जरिए ओलंपिक मंच पर कदम रखा। हालांकि, सिंगल्स में वह पहले ही दौर में बाहर हो गए, लेकिन डबल्स में अपने साथी रमेश कृष्णन के साथ शानदार प्रदर्शन करते हुए क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे। यही वह शुरुआत थी, जिसने आने वाले वर्षों में एक महान करियर की नींव रखी। भारतीय खेल इतिहास में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। लिएंडर का 1996 अटलांटा ओलंपिक में जीता गया ब्रॉन्ज ऐसा ही एक ऐतिहासिक क्षण है। इस उपलब्धि ने न सिर्फ 44 साल बाद भारत को व्यक्तिगत ओलंपिक पदक दिलाया, बल्कि पेस को ओलंपिक टेनिस में मेडल जीतने वाले पहले भारतीय और एशियाई खिलाड़ी बना दिया।



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